Saturday, September 13, 2008

फीचर फिल्म का शेष भाग 13 साल बाद (?)

साल 1995...। तवार का दिन है। सुबह सुबह नींद खुलती है, और कानों में आ जा आई बहार, ओ...मेरे राजकुमार.. तेरे बिन रहा ना जाए..टाइप का कोई गाना बिना पूछे चला आ रहा है। जो मिंकू आम दिनों में उठते उठते ही ट्वायलेट के दर्शन करता था। आज वो ब्रश करने की बजाए सीधे टीवी रुम की ओर बढ़ जाता है। किचन मेचाय बन रही है। मम्मी पिछले आधे घंटे से आवाजें लगा रही हैं... उठो बच्चों... चलो ब्रश करो... चाय बन रही है। मगर अभी तक मिंकू के अलावा दूसरे बच्चे जगे नहीं हैं मिंकू के जगने की आहट मम्मी को मिल गई है। ये बात उनके आवाज लगाने के अंदाज से जाहिर होता है..। अब मम्मी और जोर जोर से आवाज लगा रही हैं। अरे जल्दी से ब्रश करके आओ, चाय ठंडी हो रही है। मगर मिंकू पर इसका कोई असर नहीं है। वो इस कदर टीवी के सामने जम गया है, मानो उसके हटते ही प्रलय आ जाएगी जब वो टीवी पर नजरें गड़ाए बैठा होता है, उसका मुंह भी खुल जाता है। यकीन मानिए... टीवी प्रेम का ऐसा अद्भुत नजारा अब देखने को नहीं मिल सकता। टीवी रुम में ही पापा भी मौजूद हैं। मगर आज वो अखबार में इस तरह डूबे हुए हैं, मानो महीने भर का खर्चा एक ही दिन में वसूल कर लेंगे। मिंकू को ये दृश्य सरासर नागवार गुजरता है। उसे लगता है मानो टीवी का अपमान हो रहा है। इस बीच मम्मी चाय रख जाती हैं। पापा चाय पी भी लेते हैं। मगर मिंकू को कुछ भी होश नहीं है। एक के बाद एक सदाबहार गाने... जो हर दूसरे तीसरे हफ्ते रिपीट हो जाते हैं। अब तो उसके दिमाग में हर गाने की डीवीडी भी बन गई है। सीन आने से पहले ही उसके जेहन में वो दृश्य कौंध जाता है। खैर, रंगोली... खत्म हो जाती है। अब तक उसे कई बार डांट पड़ चुकी है ब्रश करने के लिए.... लिहाजा वो रंगोली खत्म होने के बाद एक मिनट भी देरी किए बिना ब्रश करने चला जाता है, डर है, अगर ऐसा नहीं किया तो, 9 बजे चंद्रकांता देखने पर पाबंदी ना लग जाए। लिहाजा वो अच्छा बच्चा बन जाता है। और करीब 15-20 मिनट में सारे काम निपटाकर नाश्ता भी कर लेता है। आज के दिन मिंकूचमुच बदला हुआ है। जो मिंकू स्कूल जाने से पहले और आने के बाद बमुश्किल ही कॉपी किताब को हाथ लगाता है। वो इतवार के दिन जल्दी से काम निपटाकर सुबह सुबह पढ़ने बैठ जाता है। दरअसल, उसे पता है...अगर उसकी ओर से कोई लूपहोल रह गया तो उसे इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। उसमालूम है, गुड्डी और विक्की भी जग गए हैं... लिहाजा चंद्रकांता तो वो किसी भी कीमत पर देख लेगा...मगर शाम में उसे फिल्म देखने से वंचित होना पड़ सकता है। लिहाजा वो ये दिखाने में कुछ भी उठा नहीं रखता कि वो कितनी पढ़ाई कर रहा है... आम तौर पर पढ़ाई करते हुए वो अपने कमरे का दरवाजा बंद कर लेता है...मगर आज तो दोनों पल्ले दो तरफ हैं। ताकि घर के लोग उसे पढ़ते हुए तो देखें ही....साथ ही साथ टीवी की भी आवाज उसे साफ सुनाई देती रहे। क्योंकि उसकी सिर्फ नजरें किताब में हैं। जेहन में तो टीवी है। इस बीच वो दूसरे कमरे में लगी घड़ी पर भी नजरे इनायत कर आता है। जैसे ही 9 बजते हैं...उसके भीतर कुछ होने लगता है। ऐसा लगता है, दिल कुछ कहा रहा है...और दिमाग कुछ और कर रहा है। दिल बैठ रहा है... कहीं चंद्रकांता का कोई सीन छूट ना जाए...।मगर दिमाग में तो कुछ और चलरहा है। जिसके आगे वो चंद्रकांता के एकाध सीन की कुर्बानी देने को तैयार है। आखिरकार... आवाज आती है...नौगढ़-विजयगढ़ में थी तकरार... नौगढ़ का था..जो राजकुमार....चंद्रकांता से करता था प्यार...। ऐसा लगता है उसके पैर बेकाबू हो जाते हैं...और वो पहुंच ही जाता है टीवी रुम में। चंद्रकांता देखने के बाद वो अच्छे बच्चों की तरह नहा धोकर.. बिल्कुल टाइम पर खाना खा लेता है। और एक बार फिर वो अपने कमरे में दिन भर पढ़ने का नाटक करता रहता है... क्योंकि शाम पांच बजे उसे हर हाल में फिल्म देखनी है...कहीं पापा पढ़ाई नहीं करने का बहाना बनाकर उसे फिल्म देखने से रोक ना दें....। इसके लिए वो दिन भर तपस्या करता है। पांच बजे से कुछ पहले ही...हक के साथ वो टीवी ऑन करता है। फिल्म शुरु होती है। अब मिंकू पूरी तरह टीवी में समा जाता है...कब डेढ़ घंटे निकल जाता है। उसे कोई होश नहीं होता...और सामने आ जाता है। फीचर फिल्म का शेष भाग....बजे। वो बार बार घड़ी देखता है.. कब फिर से शुरु हो पिक्चर। समाचार खत्म हो जाता है औऱ प्रचार शुरु हो जाता है। तभी अचानक एक टेक्स्ट प्लेट आती है.. फीचर फिल्म का शेष भाग थोड़ी देर में। अब वो और भी बेताब हो उठता... टीवी वालों को मन भर भला बुरा कहता है.. और पिक्चर शुरु हो...उससे ठीक पहले बिजली चली आ जाती है। और न जाने कितनी ही फिल्में हैं..जिनका शेष भाग आज 13 साल बीतने के बाद भी वो कभी नहीं देख पाया है।

Friday, September 12, 2008

क्या आपने भी खिंचवाई है कभी अपनी नंगी तस्वीर ?

इसी साल मार्च की बात है। चैनल की मारामारी के बीच बहन (बुआ की लड़की) की शादी आ पड़ी। हम भाई-बहनों की जेनरेशन में पहली शादी थी। लिहाजा बमुश्किल मिली दो दिन की छुट्टी में हैदराबाद पहुंच गया। जिस घर में शादी हो, उसका माहौल कैसा होता है... ये बताने की जरुरत नहीं। मगर अक्सर ही देखा है.. ऐसे माहौल में लड़की के पास कुछ खास काम नहीं होता। ऐसा ही कुछ यहां भी था। उम्र में मुझसे तकरीबन 3 साल छोटी बहन एक कमरे में चुपचाप पड़ी थी। सभी लोग अपने अपने काम में मशगूल.. हों भी क्यों ना... शाम में बारात जो आनी थी। ऐसे में जिसकी शादी थी... सबसे ज्यादा फुर्सत में वही था। बहन से मुलाकात सालों बाद हो रही थी। बीच में शिकायतों का कार्यक्रम चलता रहा। भैया.. आप तो भूल ही गए हैं.. आप कभी फोन भी नहीं करते... कभी हैदराबाद आइए ना। आखिरकार हैदराबाद मैं पहुंच ही गया था..। वो भी तब जब अगली ही सुबह बहन की विदाई होनी थी। लिहाजा मैंने सोचा उससे बात की जाए। अब तो ना जाने कब मुलाकात होगी। मैंने शुरुआत की। एक बार बात निकली तो मिनटों में बहुत दूर तक गई। हम बमुश्किल कुछ ही लम्हों में सालों का सफर तय कर गए। जवानी की उम्र से किशोरावस्था..और आखिर में बचपन..। यही वो वक्त था, जब हमारी मुलाकातें ज्यादा होती थीं। हम सभी भाई बहन गर्मियों की छुट्टी में गांव में जमा होते थे। फिर जो उधम चौकड़ी होती.. मजा आ जाता। बहन के साथ बातचीत करते हुए हम दोनों ही बचपन में पहुंच गए थे। तभी अचानक उसे शरारत सूझी और उसने कहा मेरे पास आपका एक फोटो पड़ा है जो मैं भाभी (होने वाली) को दिखाऊंगी.. और जब आपके बच्चे होंगे तब उन्हें। इतना कहकर वो जोर जोर से हंसने लगी। मैंने पूछा, भला ऐसा क्या खास है इसमें। वो कुछ भी नहीं कहती...बस जोर जोर से ठहाके लगाती। कुछ देर बाद इस बातचीत में बुआ भी शामिल हो गईं... वो भी फोटो की बात पर हंसने लगीं। देखते ही देखते छोटा भाई (बुआ का लड़का) भी बिना कुछ कहे...ठहाके लगा रहा था। लेकिन कोई कुछ बताने को तैयार नहीं था... फोटो में ऐसा क्या था। बहुत मशक्कत के बाद जब फोटो सामने आई... मैं बुरी तरह झेंप गया। इसलिए भी कि.. ये फोटो शादी में जमा हुए दूसरे लोग भी उत्सुकतावश देख रहे थे। उसमें कुछ लड़कियां भी थीं। जो हमउम्र थीं। मेरी हालत ऐसी हो गई.. जैसे काटो तो खून नहीं। दरअसल ये फोटो जब खिंची गई थी..मेरी उम्र कुछ 3 या 4 साल रही होगी। इस फोटो में मैं बिल्कुल नंगा था..। यही नहीं मेरे चेहरे पर गजब की मुस्कान थी। ये फोटो मेरी होकर भी मेरी नहीं थी, फिर भी न जाने क्यों मुझे बहुत शर्म आ रही थी। निश्चित तौर पर मुझे उस वक्त समझ नहीं थी... नंगा होना शर्म की बात है। जबसे होश संभाला.. बिना तौलिया लपेटे मैं कभी नहीं नहाया। कपड़े बदलते हुए भी हमेशा ध्यान रखा.. कोई देख तो नहीं रहा है। खैर, ये तस्वीर मेरी एक बुआ ने ही खिंची थी। बेशक उस वक्त मैं झेंप जरुर रहा था.. मगर बचपन की इस तस्वीर ने मेरे भीतर एक अजीब सा उल्लास भर दिया.. और मैं अचानक ही बेहद खुश हो गया। काफी देर तक मैं उस तस्वीर को देखता रहा...। मैं सोचता रहा.. क्या मैंने उस वक्त फोटो खींचने का विरोध किया होगा। क्या मुझे ये मालूम भी होगा उस वक्त.. कि नंगा होना अश्लीलता की श्रेणी में आ जाता है। खैर जो भी, तस्वीर के बहाने मैं अपने बचपन में गोते लगाता रहा। ये सोचकर भी अजीब से अहसास हिलोरें मार रहे थे.. अगर ये फोटो मेरी बीवी (होने वाली) या मेरे बच्चों के हाथ लगेगी... तो उन्हें कैसा लगेगा। पर मुझे लगता है... ये वो खूबसूरत हादसा है जो हममें से ज्यादातर लोगों के साथ हुआ होगा...। सचमुच बचपन का कोई जवाब नहीं..। चलते चलते आपको ये जरुर बताना चाहूंगा... ऊपर लगी तस्वीर मेरी नहीं, इंटरनेट पर अपनी ऐसी तस्वीर डालने की हिम्मत, इस उम्र में तो मैं नहीं जुटा सकता।

Thursday, September 11, 2008

ब्राह्मण परिवार का बेमिसाल इस्लाम कनेक्शन !


उसकी उम्र कुछ 65 के आस पास होगी। मुश्किल से 4 फीट की कद काठी। झुर्रियों से भरा चेहरा.. और आंखें ऐसी मानो हर सबको शक के निगाह से देखती हो। 50 साल पहले वो आई थी.. इस घर में। उसका मजहब इस्लाम है। वो पक्की मुसलमान है। मगर उसे देवी गीत से लेकर तमाम भजन जुबानी याद हैं। उसे हिंदू रीति रिवाज से होने वाले शादी विवाह के गीत भी याद हैं। चार दशक पहले उसके शौहर पर आकाशीय बिजली गिरी...और उसकी मौत हो गई। उसके चार या पांच बच्चे थे। दो बेटे और तीन बेटियां। घर परिवार में मदद करने वाला कोई नहीं था। उसका शौहर सब्जियां बेचता था। लिहाजा उसके नहीं रहने पर उसने भी यही काम शुरु किया। मगर दिक्कत ये थी... उसे जोड़ना घटाना नहीं आता था। लोग उसे भुलवाकर ज्यादा सामान ले लेते थे, और पैसे कम देते थे। वो अक्सर पास के ही गांव में सब्जी बेचने जाया करती थी। जो ब्राह्मणों का गांव था। इनमें एक घर ऐसा था..। जहां उससे लोग सबसे ज्यादा प्यार से पेश आते थे। उसे खाना भी यहां मिल जाता था। वो किसी भी बरामदे में चुपचाप सो जाती... और नींद टूटने पर चाय, पानी से लेकर खाने पीने की फरमाइश हक से करती। मानो वो इस घर की मेहमान हो। और ये घर मेरा अपना था। मेरी मां (दादी).. उसके हालात से बहुत परेशान होती.. और जब गांव में लोग उसे ठग लेते तो मां को बहुत तकलीफ होती। लिहाजा मां ने उसे बेचने खरीदने से जुड़ी तालीम देनी शुरु की। धीरे धीरे वो जोड़ना घटाना भी सीख गई। और एक वक्त ऐसा भी आया जब वो दूसरों को ही चकमा देने में उस्ताद हो गई। खैर...। मेरे बाबूजी की कुल जमा उम्र 10-12 साल रही होगी.. जबसे ये मुसलमान बेवा हमारे घर का हिस्सा बनी हुई । वो इस घर में होने वाली तमाम शुभ अशुभ घटनाओं का हिस्सा बनी है। उसने शादी-विवाह से लेकर मय्यत तक देखी है। मेरी जेनरेशन के बच्चों को तो बड़े होने पर ही पता चल पाया कि वो हमारी कोई रिश्तेदार नहीं है।नहीं तो सभी कूजड़िन आजी करते रहे। बेशक बच्चे अक्लमंद हो गए.. मगर उन्हें भी उससे बहुत लगाव है। घर में कुछ भी खाने पीने को बने तो.. हर किसी को ध्यान रहता कि कूजड़िन आजी को मिला या नहीं। अब उसके बच्चों के भी बच्चे हो चुके हैं। मगर उसकी बहुओं ने उसे घर से निकाल दिया है। 65 70 की उम्र में भी वो अपना पेट खुद भरती है। ये अलग बात है... उसे इसकी चिंता नहीं करनी पड़ती.. जब भी उसके पास किल्लत होती है। वो हमारे यहां डेरा डाल देती है। हालांकि पहले के मुकाबले उसका आना जाना कम ही हो पाता है। मगर वो नहीं होकर भी घऱ में होती है। छोटे से लेकर बड़े तक हर कोई उसके बारे में खोज खबर लेता रहता है। उसका जिक्र हमेशा होता रहता है। बहुत दिन हो जाने पर घर के लोगों को ये भी डर सताने लगता है कहीं वो इस दुनिया से चली तो नहीं गई। लोग परेशान होते हैं.. इसी बीच वो कहीं न कहीं से टपक पड़ती है। वो सही मायने में इस घर का हिस्सा है..। बुआ वगैरह फोन पर भी उसकी खोज खबर लेती रहती हैं। जब वो ससुराल से यहां आती हैं तो बाकी लोगों की तरह ही कुजड़िन के लिए भी कुछ ना कुछ तोहफा होता है उनके पास। बहुत अजीब है ये कहानी.. एक हार्ड कोर ब्राह्मण परिवार में एक मुसलमान महिला दशकों से ऐसे रह रही है.. जैसे वो इसी परिवार की हो। ऊपर लगी तस्वीर, कूजड़िन आजी की है। पिछली बार गांव गया था तो मैंने खींच ली थी। ब्राह्मण परिवार का ये एक ऐसा इस्लाम कनेक्शन है...जो निजी तौर पर मुझे बहुत सकून देता है।

Wednesday, September 10, 2008

9 साल के बच्चे की लव स्टोरी !

प्यार, हर किसी के लिए एक अलग अहसास है। इसकी परिभाषाएं जुदा जुदा हो सकती हैं। रिश्ते नाते संबंध और समाज की बुनावट... भला प्यार का इनसे क्या वास्ता। ये लव स्टोरी है, एक बच्चे की... जिसकी कुल जमा उम्र 9 साल थी। चौथे दर्जे में पढ़ने वाले इस बच्चे की जिंदगी में पहली बार टीवी दाखिल हुआ था। यूं तो वो पहले भी रामायण और महाभारत जैसे सीरियल्स दूसरों के घर जाकर देखा करता था। मगर ऐसा पहली बार हुआ था कि टीवी खुद उसके घर में हो। दरअसल पढ़ाई करने के लिए उसे अपनी बुआ के यहां भेज दिया गया था। जहां उसके लिए टीवी ही सबसे बड़ी उपलब्धि थी। लिहाजा अब वो सीरियल्स के साथ साथ फिल्में भी देखने लगा। ज्यादातर फिल्मों में एक लड़का और एक लड़की के बीच प्यार जैसे किस्से दिखते थे। दूसरे बच्चे इस उम्र में क्या सोचते थे.. कौन सी बातें उनके जेहन में घूमती थीं.. इसकी भनक उसे नहीं थी। मगर उसके दिलोदिमाग पर फिल्मों का असर बहुत ज्यादा पड़ा। एक अनजानी लड़की इसी उम्र में सपनों की रानी बन गई थी, जिससे वो बिल्कुल फिल्मी अंदाज में प्यार करना चाहता था। बात थोड़ी अजीब है.. मगर ये सौ फीसदी सच है। अब उसे लड़कियां फिल्मों की किरदार जैसी नजर आती थीं..। लिहाजा वो उनसे घुलमिल भी नहीं पाता था। मगर हर उस लड़की के बारे में कल्पनाएं बुनता था.. जो कभी कभार उससे प्यार से पेश आ जाती थी। शायद वो अपने उम्र के लड़कों से बड़ा हो चुका था। इसी उम्र में उसमें तमाम वो अहसास पैदा हो चुके थे... जो आम तौर पर जवानी की दहलीज पर कदम रखते हुए किशोरों के दिलों में जगते हैं। बुआ के यहां रहने के लिए उसे अपनी मां से दूर जाना पड़ा था..। सो कहीं न कहीं ये कमी भी.. उसे ऐसे सपनों में डूबने उतराने के लिए जिम्मेदार रही। कोई लड़की उसे कुछ खाने को देती..कोई लड़की उससे कॉपी मांग लेती... या फिर कोई लड़की उससे कुछ देर बात भी कर लेती तो उस दिन के बाद वो उसकी जूलिएट बन जाती। दिन रात खयालों में बस उसी का चेहरा। यहां तक कि फिल्में देखते वक्त.. हिरोइन की जगह उसका ही चेहरा दिखता। उस बच्चे के स्कूल में उसकी बुआ की रिश्ते की ननद भी पढ़ती थी.. वो भी उसी की क्लास में। जाहिर है, उसकी उम्र भी कुछ वही रही होगी। घर आस पास थे। लिहाजा उसकी पहली महिला मित्र वही लड़की बनी। स्कूल में बातचीत का सिलसिला चल पड़ा था... एक दूसरे के घर भी आने जाने लगे। खेलकूद से लेकर मारपीट तक हर जगह वो साथ थे। 9 साल के उस बच्चे की कोरी कल्पनाओं में रंग सा भर गया था.. उसकी कल्पनाओं की प्रेमिका उसे मिल गई थी। फिल्म ठीक ठाक चल रही थी, तभी एक दिन विलेन की एंट्री हुई। दरअसल उसके फूफाजी का ट्रांसफर हो गया। और अब उन्हें कहीं और जाना था। उसके अलावा उस परिवार के बाकी सारे लोग खुश थे। नए और अपेक्षाकृत बड़े शहर में रहने की हसरतें हिलोरें मार रही थीं...। मगर वो बच्चा बेहद उदास हो गया। उसे बाकी कोई चिंता नहीं थी... परेशानी थी तो बस ये वो अपनी प्यारी दोस्त से दूर हो जाएगा। वो छिप छिपकर रोता था। गुमशुम रहता था, मगर किसी से कहे तो क्या कहे। शायद वो अपनी उम्र से कोसों दूर निकल चुका था। उसके अहसास इसी उम्र में जवान हो चुके थे। आखिरकार एक दिन सारा सामान बांधकर.. । उस शहर से जाना पड़ा। और हमेशा के लिए उसका पहला प्यार अधूरा रह गया। ऐसा नहीं वो उस लड़की से दोबारा नहीं मिला... मिला मगर सालों बाद जब वो बड़ा हो चुका था। और अबकी बार वो तमाम अहसास कहीं नहीं थे। क्योंकि बड़े होने के साथ साथ वो दुनिया की तमाम हकीकतों से वाकिफ हो चुका था। दरअसल, ये लव स्टोरी 9 साल के लड़के की थी। जो जानता तक नहीं था.. कि रिश्ते की बुआ के साथ भी ऐसे सपने बुने नहीं जा सकते..। यूं तो ये मेरी अपनी ही कहानी है। मगर अब महसूस नहीं होता..क्या वो मैं ही था,या कोई और...?

Tuesday, September 9, 2008

जब 3 रुपए में बेची अपनी ईमानदारी !

साल 2003 की बात है। उस वक्त दिल्ली में बस का न्यूनतम किराया 3 रुपए की बजाए 2 रुपए हुआ करता था। आईआईएमसी में 9 महीने का हनीमून खत्म हो चुका था। जिंदगी की क्रूरतम सच्चाईयों से रुबरु होने का वक्त चुका था। एक-एक रुपए की कीमत समझ में आने लगी थी। खर्चे बढ़ गए थे, मगर घर से मिलने वाला बेरोजगारी भत्ता जस का तस था। लिहाजा, जहां पैसे बचाए जा सकते थे, बचा लेते थे। किसी की ईमानदारी की कीमत भला क्या हो सकती है। फिर भी लोग मानते हैं, बहुत मोटी रकम मिले तो बेईमानी को जस्टिफाई किया जा सकता है। मगर मैंने तो महज 3 रुपए के लिए कितनी ही बार अपनी ईमानदारी बेची है। जी हां, पचासों बार मैंने 5 रुपए के बदले 2 रुपए और 10 के बदले 7 रुपए का टिकट लेकर बस में सफर किया है। ताकि 3 रुपए बच सकें... क्योंकि उस वक्त इन 3 रुपयों की कीमत बहुत ज्यादा थी...शायद आज के 500 रुपयों से भी ज्यादा। क्योंकि आमदनी का कोई दूसरा जरिया नहीं था, घर से जो पैसे मिलते थे.. उससे बस दिल्ली में जिंदा भर रहा जा सकता था। लेकिन 3 रुपए की बेईमानी भी आसान नहीं थी। इसके लिए बस स्टैंड पर जहां बाकी के लोग डीटीसी बसों का इंतजार कर रहे होते थे, मैं प्राइवेट बस की ताक में रहता। खाली से खाली डीटीसी बस आंखों के सामने से गुजर जाती मगर मैं खड़ा रहता... क्योंकि मेरे जेहन में 3 रुपए बचाने की मजबूरी घुमड़ती रहती थी। यकीन मानिए.. 3रुपए बचाने के लिए इतना ज्यादा खून जलाना पड़ता था, जो 500 रुपए के मेवे खाकर भी नहीं बनता। मसलन, बस में चढ़ने के बाद सबसे पहले कंडक्टर से टिकट लेने तक मन में इतने बवंडर उठ रहे होते.. जिनका कोई हिसाब नहीं है। खुद को उस झूठ के लिए तैयार करना पड़ता... जो बेहद मामूली होती थी। टिकट लेने के दो तरीके होते हैं। पहला ये कि आप जगह का नाम बता दें दूसरा ये कि आप सीधे बोल दें 2 रुपए का अगर कंडक्टर सीधे तौर पर टिकट देदे तो ठीक पर कहीं वो पलटकर पूछ दे..।कहां जाना है.. तो समझिए... मन के भीतर भूचाल जाता था। कई बार तो झूठ बोलते हुए होंठ तक कांप जाते थे। मगर क्या करते, 3 रुपए बहुत होते थे उस जमाने में। टिकट लेने के बाद भी तब तक चैन नहीं होता, जब तक कि अपनी मंजिल तक ना पहुंच जाएं। लगता रहता कि कहीं कंडक्टर आकर पूछ ना दे भई तूने तो 2 का लिया था.. कहां तक जाएगा। लिहाजा, टिकट लेकर कोने में दुबके रहते कहीं कंडक्टर का ध्यान ना चला जाए। यही नहीं, साथ सफर कर रहे लोगों से भी कई दफा नजर टकरा जाती तो लगता मानो वो पूछ रहा हो...अबे बेईमान 2 रुपए में कहां तक जाएगा... मगर क्या करते, पैसों की किल्लत....बेरोजगारी की अनिश्चितता भरी जिंदगी... और बेतहाशा बढ़ती महंगाई के बीच...3 रुपए अपनी औकात से कई गुना ज्यादा होते थे। जिस ईमानदारी को कोई करोड़ों में नहीं खरीद सकता... उसे खुद मैंने महज 3 रुपए में कितनी ही बार बेचा है.. अब सोचता हूं तो लगता है.. 3 रुपए भी कम नहीं होते....

Sunday, September 7, 2008

आखिर क्यों नहीं हो पाती एंकर्स से दोस्ती ?

न्यूज एंकर.. यानि चेहरा किसी भी चैनल का। एक ऐसा शख्स जिसे हर हाल में खबर पढ़नी है.. बेशक टेली प्रांप्टर काम करना बंद कर दे। या फिर, टीवी स्क्रीन पर विजुउल्स फ्रीज हो जाएं...वो चुप नहीं हो सकता...उसके पास कोई एक्स्क्यूज नहीं हो सकता। स्टार न्यूज में तकरीबन पौने दो साल काम करते हुए.. गिने चुने एंकर्स से ही मेरी बात होती थी.. कुछ से इसलिए कि अभी वो बड़े एंकर नहीं हो पाए थे.. तो कुछ से इसलिए कि मेरा शो उनको ही करना था। यानि कुल मिलाकर ये एक किस्म की आपसी मजबूरी का नतीजा था। बाकी के तमाम एंकर्स ऐसे भी थे.. जिनसे जान पहचान तक नहीं हो पाई... वजहें तमाम थीं, मसलन बड़े चैनल का बड़ा एंकर.. किसी को बस यूं ही मुंह नहीं लगाना चाहता। दूसरी वजह ये कि खुद को जर्नलिस्ट मानने वाले मेरे जैसे डेस्क के कारिंदों की एंकर्स के बारे में धारणा। मसलन एंकर करता ही क्या है.. उसे तो बस पका पकाया मिल जाता है...जान तो उनकी जाती है जिन्हें टीवी पर दिखने का सुख नसीब तक नहीं होता। खैर, नए संस्थान में आकर ये गलतफहमी काफी कुछ दूर हो गई है। इसके अलावा एक बड़ी वजह ये थी..कि एंकर्स की बिरादरी में महिलाओं की तादाद भी अच्छी खासी होती है। स्टार न्यूज भी इसका एक्सेप्शन नहीं था... अब एक तो महिला..ऊपर से खूबसूरत.. उस पर भी जलवा ये कि मैडम को करोड़ों लोग टीवी पर निहारते हैं। ऐसे में दिमाग सातवें आसमान पर पहुंचे.. ऐसे एकाध ही उदाहरण मेरे सामने थे। लिहाजा मेरी ठसक भी एंकर्स से मेल जोल के आड़े आई। और इसका खामियाजा ये हुआ कि मैं चैनल में काम करने वाले उस एलीट क्लास का हिस्सा नहीं बन पाया.. जो केवल एंकर्स (महिला) से हंसी मजाक करते थे.. बल्कि फ्लर्टिंग तक की रियायत का मजा उठाते थे। जिस वक्त वो एंकर्स से बातचीत कर रहे होते थे...खुशी और अहंकार से फूलकर उनका सीना बाहर को निकल आता। और इस सुख से वंचित लोग उन्हें ऐसे देखते जैसे...छप्पन भोग का मजा लेने वाले को कोई भूख से बिलबिलाता इंसान देखता है। एक खास बात और ये.. कि डेस्क या रिपोर्टिंग में ज्वाइन करने वाला कोई भी जूनियर हर वक्त यही जानने की ताक में रहता कि फलाना एंकर की तनख्वाह कितनी है। ले देकर एंकर्स का अपना ही जलवा होता है.. ट्रेनी से लेकर चैनल के सीईओ तक को उनसे बात करते हुए एक अलग ही किस्म का अहंकारबोध होता है, जैसे एंकर किसी और ही ग्रह से धरती पर उतरे हों.. रनडाउन पर बैठने वाले प्रोड्यूसर बिरादरी के लोग कई बार उनका जलवा हजम नहीं कर पाते हैं.. लिहाजा किसी ना किसी बहाने उन्हें हड़काने का मौका कोई चूकता नहीं। मगर ये बात बड़े चैनल या छोटे चैनल के निरीह छोटे एंकर्स पर ही लागू होती है। बड़े एंकर्स तो हमेशा बड़े होते हैं.. वो छोटे चैनल में हों या फिर बड़े चैनल में। बड़ा एंकर होने का मतलब ये कतई नहीं है.. कि साहब बहुत काबिल हैं। ज्यादातर बड़े एंकर इसलिए बड़े होते हैं क्योंकि वो बड़ी से बड़ी गलती करने के बाद भी आन एयर सहज रहते हैं। जबकि छोटा एंकर हड़बड़ाकर सॉरी बोल ही पड़ता है। और बॉसेज को पता चल जाता है कि फलाना बहुत गलती करता है.. लेकिन एक बात तो तय है.. एंकर छोटे चैनल का हो.. या फिर बड़े चैनल का। उसके जेहन में ये हमेशा घूमता रहता है.. वो अलग है.. कुछ खास है। बेशक उसे ठसमठस्स भरी बस में ही सफर क्यों ना करना पड़ता हो... उसे वही सड़ा हुआ कैंटीन का खाना क्यों ना खाना पड़ता हो...उसे ड्रॉपिंग के लिए घंटों इंतजार क्यों ना करना पड़ता हो.. भला वो खुद को आम क्यों समझ ले... उसके नाम पर तो आर्कुट जैसी कम्यूनिटी वेबसाइट्स पर फैन्स क्लब तक बने होते हैं। कुछेक एंकर्स को मैं जानता हूं.. जिनके लिए बकायदा लड़कियों की चिठ्ठियां तक आती हैं...,जिसमें वो अपना कलेजा ही निकालकर रख देती हैं। अगर आप गौर करें तो दर्जनों न्यूज चैनल पर हर रोज पचासों एंकर दिखते हैं.. मगर नाम से जिन्हें लोग पहचानते हैं.. उनमें विनोद दुआ, दिबांग, पुण्यप्रसून वाजपेयी, अजय कुमार, दीपक चौरसिया, करन थापर और अलका सक्सेना जैसे एंकर्स अंगुलियों पर गिने जा सकते हैं... मगर शोहरत की वर्चुअल दुनिया में टहलने वाले ज्यादातर एंकर इस बात को महसूस नहीं कर पाते..शायद यही वजह है एक ही संस्थान में काम करने वाले लोग बिल्कुल उतने ही दूर होते हैं.. जितना कि हजारों मील दूर बैठा वो दर्शक जिसे ये वहम होता है.. कि एंकर को सारी खबरें याद होती हैं.. और वो खटाखट बोलता जाता है.... हो सकता है, दूसरों के तजुर्बे अलग हों.. मगर मैं आज तक नहीं समझ पाया.. आखिर क्यों नहीं हो पाती एंकर्स से दोस्ती ?

5 सितंबर, 2002- आईआईएमसी और मैं !

पांच सितंबर, यानि शिक्षक दिवस। आईआईएमसी से डिग्री तो मिली ही, कुछ ताउम्र याद रहने वाली यादें भी मिलीं।उनमें से एक है 5 सितंबर, 2002... अपने कोर्स डायरेक्टर के प्रति सम्मान दिखाने के लिए कविता लिखी थी मैंने...। जिसे उन्होंने अपने कमरे में लगा दिया...। मेरे आईआईएमसी के तत्कालीन साथियों में से कुछ ने इसे चाटुकारिता का प्रतिमान करार दिया था...। जिन्होंने बाद में न जाने कितने ही ऐसे प्रतिमान सचमुच में बनाए। 20 साल की उम्र में मिला ये एक ऐसा घाव था, जिसका जख्म सूख तो गया, मगर उसके निशान बहुत गहरे हैं, जो शायद कभी मन से मिट न पाएं..। लेकिन ये बात मैं यहां इसलिए नहीं लिख रहा कि दो दिन पहले शिक्षक दिवस था। दरअसल, ये मेरा तीसरा ब्लाग है.. इससे पहले बात निकलेगी तो.. और ऑफ द रिकॉर्ड नाम से दो ब्लाग बनाए.. इनमें से एक टेक्निकल प्राब्लम की वजह से विकलांग हो गया तो दूसरा ब्लॉग 'ऑफ द रिकॉर्ड' कम्यूनिटी ब्लॉग की शक्ल ले चुका है... जहां बुद्धिजीवी किस्म के लोग अपनी भड़ास निकालते रहते हैं.. उनमें मैं भी शामिल हूं। मगर कुछ दिनों से लग रहा था, एक निहायत ही निजी ब्लॉग होना चाहिए... सो.. मैंने ये ब्लॉग बना डाला.. कोशिश होगी.. बौद्धिक लफ्फाजी की बजाए... इसे जिंदगी के तजुर्बों का एक कोलाज बनाऊं...इसी क्रम में आईआईएमसी के दिनों का ये नायाब तजुर्बा और इसी बहाने ये पहली पोस्ट...।