अगर ये लड़की उस टाइप की होती.. तो कहानी का शीर्षक कुछ और हो सकता था...लेकिन ऐसा नहीं था। वो कुछ अलग टाइप की लड़की थी.., ये बात अलग है.... आज भी गांवों और छोटे शहरों की ज्यादातर लड़कियां उसी के जैसी होती हैं। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में दो साल लड़कियों से सामान्य शिष्टाचार के बगैर ही गुजर गए..। सिविल की तैयारी फर्स्ट इयर से ही शुरु कर दी थी..लिहाजा यूनिवर्सिटी में क्लासेज अटेंड करना टाइम की बर्बादी लगता था। सब कुछ ठीक चल रहा था..लेकिन कहीं न कहीं जिंदगी में लड़की नाम की प्राणी का नहीं होना भी बेहद अखरता था। ये सब कुछ बेहद नेचुरल था। समय भागता जा रहा था, इस बीच कहीं न कहीं ये अहसास भी कुलबुला रहा था..ग्रेजुएशन करके पूरी तरह से पढ़ाई में जुट जाने के बाद लड़कियों से बातचीत तक का मौका नहीं मिलेगा। आखिरकार फिल्मों में दिखने वाली कॉलेज लाइफ की रुमानियत ने इतना मजबूर किया.. जानबूझकर मैंने थर्ड ईयर में मेडिवल हिस्ट्री की क्लासेज अटेंड करनी शुरु कीं, जिनका मैंने पहले के दो सालों में दर्शन भी नहीं किया था। और ऐसा पूरी तरह सोची समझी रणनीति के तहत हुआ...। 18 साल की उम्र में बालिग होने का अहसास भी हिलोरें मार रहा था.. साथ ही साथ ये डर भी सता रहा था.. कॉलेज लाइफ बस यूं ही गुजर जाएगी। और मैं युवा हुए बगैर ही... सिविल की तैयारी करते करते बुजुर्गावस्था को प्राप्त हो जाउंगा। लिहाजा, मेडिवल हिस्ट्री में लड़कियों की बड़ी खेप होने की अफवाहों के बीच.....मैंने क्लास अटेंड करने शुरु कर दिए। यूं तो मैं इंग्लिश मीडियम का स्टूडेंट था। मगर लड़कियों की आबादी हिंदी मीडियम में ज्यादा होगी... इस कैलकुलेशन के हिसाब से हिंदी मीडियम में ही क्लास करना शुरु कर दिया...।
अफवाहों में दम था। क्लास में पहुंचने वाली आबादी में एक बड़ी खेप लड़कियों की थी। ये देखकर मेरा हौसला और बढ़ा। दिन चढ़ने तक बिस्तर में दुबके रहने वाला मेरे जैसा इंसान.. सुबह सुबह 7 बजे की क्लास में पहुंचने लगा। धीरे धीरे लड़कियों से भी जान पहचान बढ़ी। मगर जिस लड़की से अनायास ही बात करने का मन होता.. वो जब देखो तब किताबों में ही गोते लगाती रहती थी। कई बार तो हैरानी होती..जिस माहौल में लोग हंसी ठहाके लगा रहे होते... वो किताबों में कैसे खोई रहती। बहुत अजीब लगता..। लेकिन इसी अजीब की वजह से उससे बात करने की इच्छा प्रबल होती गई। अगले कुछ दिनों में मैंने हाय... हलो.. तक बात बढ़ाई....मगर इससे ज्यादा कोई दूसरी बात नहीं होती। इस लड़की की काया.. कुछ ऐसी थी.. कहां शुरु होती.. और कहां खत्म हो जाती.. इसका अंदाजा लगाना मुश्किल था। सुंदरता के बेहद फीजिकल मानदंडों पर वो कहीं भी खड़ी नहीं हो सकती थी। दिखने में बेहद सामान्य किस्म की । कद बमुश्किल 4 फुट और कुछ इंच। रंग गोरा.. लेकिन अजीब सा फीकापन लिए हुए। बाल लंबे....मगर उनमें इतना तेल...। यानि देखने में कोई भी ऐसी बात नहीं थी.. जो उस उम्र में मुझे किसी लड़की से बात करने के लिए मजबूर करे। फिर भी, उसकी चुप्पी...उसका एकाकीपन... मुझे उसकी ओर खींचता था। उस वक्त तक मेरी किसी लड़की से दोस्ती नहीं थी.. लिहाजा, एक दिन अचानक मेरे दिमाग में उससे दोस्ती करने का फितूर सवार हुआ। जबकि ना तो मैं उसकी ओर आकर्षित हो रहा था.. ना ही कोई रोमांटिक या भावनात्मक खिंचाव ही था। मेरे सपनों में आने वाली लड़कियों के मुकाबले वो कहीं नहीं ठहरती थी। फिर भी... मैं उससे दोस्ती करने पर आमादा हो गया। यूं तो किसी से दोस्ती करना बेहद सामान्य बात है.. लेकिन इस कहानी के उतार चढ़ाव के लिहाज से मैं "फितूर’’ और ‘आमादा’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर रहा हूं।
खैर, एक दिन मैंने उसके सामने दोस्ती का प्रस्ताव रख दिया। मैंने उससे कहा...’मैं तुमसे दोस्ती करना चाहता हूं...।’ ये सुनते ही वो परेशान हो उठी। उस दिन बिना कुछ बोले वो वहां से चली गई। अगले तीन चार दिनों तक उसका कोई अता पता नहीं चला। फिर एक दिन अचानक वो प्रगट हुई। क्लास खत्म होने के बाद उसने मुझे इशारों से बुलाया। मैं दोस्ती के प्रस्ताव को हरी झंडी मिलने की उम्मीद में विजयी भाव में उसके पास पहुंचा..। पर यहां तो पासा उल्टा पड़ गया था। उसने बिना लाग लपेट के साफ लहजे में कहा कि वो मेरी दोस्त नहीं बन सकती। जिस हिकारत भरे अंदाज में उसने ये बात कही.. मेरी सहज इच्छा.. मेरी जिद बन गई। मैंने एक लाइन में जानना चाहा....आखिर क्यों नहीं बन सकता मैं उसका दोस्त..। उसने कहा... वो इसका जवाब नहीं देना चाहती। मैंने फिर उसे कुरेदा.. पर वो कुछ कहे बिना ही वहां से चलती बनी। अब मुझे कुछ भी होश नहीं था, मैं क्या कर रहा हूं..। मैं उसके पीछे पीछे चलने लगा। उसे ये बात बुरी लग रही थी। उसे लग रहा था, बाकी के सभी लोग उसी को देख रहे हैं। यूनिवर्सिटी कैंपस से होते हुए.. वो जानबूझकर यूनिवर्सिटी रोड की ओर से निकलकर कटरा बाजार में चली गई। उसे लगा कि अब तक मैं जा चुका होउंगा..। मगर मैं अपने सवाल का जवाब मिले बिना मानने वाला नहीं था। मैं उससे एक निश्चित दूरी पर ठीक उसके पीछे ही चल रहा था। कुछ देर बाद जब उसकी नजर मुझ पर पड़ी तो वो सकपका गई...। अब उसके पास पीछा छुड़ाने का एक ही रास्ता था। वो फट से एक लेडीज टेलर की दुकान में घुस गई...। अपने आपे से बाहर निकल चुका मैं...उसके पीछे पीछे लेडीज टेलर की दुकान में घुस गया।अब तो जैसे उसका आखिरी दांव भी चूक गया था।
आखिरकार उसने मुझे एक कोने में बुलाया। और एक लगातार बोलती गई... "देखो...मैंने आज तक कभी किसी लड़के से बात तक नहीं की थी.. तुम वो पहले लड़के हो.. जिससे मैं थोड़ी बहुत बात करने लगी थी...लेकिन इसका मतलब ये नहीं है....मैं...(एक फुल स्टाप के बराबर चुप्पी).... मेरे पिताजी रेलवे में काम करते हैं.... हम लोग बिहार के रहने वाले हैं....हमारे घर में लड़कियों को पढ़ने की आजादी नहीं है... मैं घर में पहली लड़की हूं.. जिसे यूनिवर्सिटी में रेगुलर बीए करने का मौका मिला... मेरी तीन बहने हैं... और मैं उनमें सबसे बड़ी हूं....मेरे घर के लोग बहुत रुढ़िवादी हैं... हमारे घर में लड़कों से दोस्ती करने की आजादी नहीं है..... वैसे भी... मुझे इन चीजों में कोई इंटरेस्ट नहीं है... मैं तो पढ़ाई लिखाई पूरी करके....अपनी गुरुमां (कोई आध्यात्मिक गुरु) के आश्रम में चली जाऊंगी... प्लीज आइंदा से मेरा पीछा मत करना... तुम अच्छे लड़के हो... लेकिन मैं किसी से दोस्ती नहीं कर सकती... वैसे भी तुम्हें बता दूं.... मैं उस टाइप की लड़की नहीं हूं...।" कहानी खत्म हो गई, पर उसके जेहन में कायम लड़कियों की उस कैटेगरी का पता नहीं चल पाया.. जिसमें शामिल हो जाने के भय मात्र से उसका चेहरा पीला पड़ गया था...।
Monday, September 22, 2008
मैं उस टाइप की लड़की नहीं हूं...!
Thursday, September 11, 2008
ब्राह्मण परिवार का बेमिसाल इस्लाम कनेक्शन !
उसकी उम्र कुछ 65 के आस पास होगी। मुश्किल से 4 फीट की कद काठी। झुर्रियों से भरा चेहरा.. और आंखें ऐसी मानो हर सबको शक के निगाह से देखती हो। 50 साल पहले वो आई थी.. इस घर में। उसका मजहब इस्लाम है। वो पक्की मुसलमान है। मगर उसे देवी गीत से लेकर तमाम भजन जुबानी याद हैं। उसे हिंदू रीति रिवाज से होने वाले शादी विवाह के गीत भी याद हैं। चार दशक पहले उसके शौहर पर आकाशीय बिजली गिरी...और उसकी मौत हो गई। उसके चार या पांच बच्चे थे। दो बेटे और तीन बेटियां। घर परिवार में मदद करने वाला कोई नहीं था। उसका शौहर सब्जियां बेचता था। लिहाजा उसके नहीं रहने पर उसने भी यही काम शुरु किया। मगर दिक्कत ये थी... उसे जोड़ना घटाना नहीं आता था। लोग उसे भुलवाकर ज्यादा सामान ले लेते थे, और पैसे कम देते थे। वो अक्सर पास के ही गांव में सब्जी बेचने जाया करती थी। जो ब्राह्मणों का गांव था। इनमें एक घर ऐसा था..। जहां उससे लोग सबसे ज्यादा प्यार से पेश आते थे। उसे खाना भी यहां मिल जाता था। वो किसी भी बरामदे में चुपचाप सो जाती... और नींद टूटने पर चाय, पानी से लेकर खाने पीने की फरमाइश हक से करती। मानो वो इस घर की मेहमान हो। और ये घर मेरा अपना था। मेरी मां (दादी).. उसके हालात से बहुत परेशान होती.. और जब गांव में लोग उसे ठग लेते तो मां को बहुत तकलीफ होती। लिहाजा मां ने उसे बेचने खरीदने से जुड़ी तालीम देनी शुरु की। धीरे धीरे वो जोड़ना घटाना भी सीख गई। और एक वक्त ऐसा भी आया जब वो दूसरों को ही चकमा देने में उस्ताद हो गई। खैर...। मेरे बाबूजी की कुल जमा उम्र 10-12 साल रही होगी.. जबसे ये मुसलमान बेवा हमारे घर का हिस्सा बनी हुई । वो इस घर में होने वाली तमाम शुभ अशुभ घटनाओं का हिस्सा बनी है। उसने शादी-विवाह से लेकर मय्यत तक देखी है। मेरी जेनरेशन के बच्चों को तो बड़े होने पर ही पता चल पाया कि वो हमारी कोई रिश्तेदार नहीं है।नहीं तो सभी कूजड़िन आजी करते रहे। बेशक बच्चे अक्लमंद हो गए.. मगर उन्हें भी उससे बहुत लगाव है। घर में कुछ भी खाने पीने को बने तो.. हर किसी को ध्यान रहता कि कूजड़िन आजी को मिला या नहीं। अब उसके बच्चों के भी बच्चे हो चुके हैं। मगर उसकी बहुओं ने उसे घर से निकाल दिया है। 65 – 70 की उम्र में भी वो अपना पेट खुद भरती है। ये अलग बात है... उसे इसकी चिंता नहीं करनी पड़ती.. जब भी उसके पास किल्लत होती है। वो हमारे यहां डेरा डाल देती है। हालांकि पहले के मुकाबले उसका आना जाना कम ही हो पाता है। मगर वो नहीं होकर भी घऱ में होती है। छोटे से लेकर बड़े तक हर कोई उसके बारे में खोज खबर लेता रहता है। उसका जिक्र हमेशा होता रहता है। बहुत दिन हो जाने पर घर के लोगों को ये भी डर सताने लगता है कहीं वो इस दुनिया से चली तो नहीं गई। लोग परेशान होते हैं.. इसी बीच वो कहीं न कहीं से टपक पड़ती है। वो सही मायने में इस घर का हिस्सा है..। बुआ वगैरह फोन पर भी उसकी खोज खबर लेती रहती हैं। जब वो ससुराल से यहां आती हैं तो बाकी लोगों की तरह ही कुजड़िन के लिए भी कुछ ना कुछ तोहफा होता है उनके पास। बहुत अजीब है ये कहानी.. एक हार्ड कोर ब्राह्मण परिवार में एक मुसलमान महिला दशकों से ऐसे रह रही है.. जैसे वो इसी परिवार की हो। ऊपर लगी तस्वीर, कूजड़िन आजी की है। पिछली बार गांव गया था तो मैंने खींच ली थी। ब्राह्मण परिवार का ये एक ऐसा इस्लाम कनेक्शन है...जो निजी तौर पर मुझे बहुत सकून देता है।




